एक अनुशाशन पसंद इंसान कब तानाशाह बन जाता है उसे पता नहीं चलता उसे लगता ये जरुरी ये तो करना ही चाहिए मगर ऐसा करते करते वो तानाशाही के तरीके पर चलने लगता है। कब वो अनुशाशन की सिमा को लांग कर तानशाही के नकारात्मक आकर्षण बल में समावेश हो जाता उसे पता नहीं चलता। दर असल तानाशाही और अनुशाशन की सीमा आपस में इस तरह सम्मिलित हैं की शुआती दौर में इसका सही सही फ़र्क़ कर पाना थोड़ा मुश्किल होता है। तानाशाही केवल सामने वाले को ही नुक्सान नहीं पहुंचाती बल्कि स्वयं उस व्यक्ति को भी एक नकारात्मक ऊर्जा की तरफ खींच लेती है। एक इंसान का एक ही समय में कई व्यक्ति से अनबन होना भी एक प्रकार के तानाशाही के रूप रेखा की पहचान है।
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