My Blog List

Saturday, 6 June 2015

बड़ा बेबस सा होगया मैं इस ज़माने में

बड़ा बेबस सा  होगया मैं इस ज़माने में
जाने क्या खता हुई चंद सिक्के कमाने में

कुछ काम अधूरा सा एक ख्वाब पुरानी सी
दिल उलझा रहा कुछ ऐसे ही छोटे से फ़साने में

कब तक रोकूँ इस आह को या रब
उलझा सा रहा हूँ मै तदबीर बनाने में

No comments:

Post a Comment

ज़िंदगी में हर इंसान से दो बार मुलाकात होती है।

दिल्ली 2009: दिल्ली मेट्रो प्रोजेक्ट के दौरान, जब मैं DYWIDAG कंपनी में कार्यरत था, तब मेरी दोस्ती जर्मनी से आए एक सहकर्मी से हुई। काम के द...